भारतीय संविधान की उद्देशिका के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- (1) उद्देशिका संविधान का भाग है, जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने केशवानंद भारती मामले (1973) में पुष्टि की।
- (2) उद्देशिका का अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संशोधन किया जा सकता है, परंतु संशोधन संविधान के मूल ढांचे को नहीं बदल सकते।
- (3) उद्देशिका न्यायालय में प्रवर्तनीय है और इसके प्रावधान न्यायालयों द्वारा लागू कराए जा सकते हैं।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- Aकेवल (1) और (3)
- B(1), (2) और (3)
- Cकेवल (1)
- Dकेवल (1) और (2)
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (d) केवल (1) और (2)
व्याख्या
कथन (1) और (2) सही हैं, और (3) गलत है।
- बेरुबारी यूनियन मामले (1960) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि उद्देशिका संविधान का भाग नहीं है। केशवानंद भारती (1973) में उसने माना कि उद्देशिका संविधान का भाग है।
- उद्देशिका का अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संशोधन किया जा सकता है, परंतु इस प्रकार नहीं कि मूल ढांचे को क्षति पहुंचे। इसका एक बार संशोधन हुआ है, 42वें संशोधन (1976) द्वारा, जिसने "समाजवादी", "पंथनिरपेक्ष" और "अखंडता" शब्द जोड़े।
- उद्देशिका न्यायालय में प्रवर्तनीय नहीं है: कोई न्यायालय इसे लागू नहीं करा सकता। जहां संविधान का पाठ स्पष्ट नहीं है, वहां यह उसकी व्याख्या में सहायता करती है।