स्वामी दयानंद द्वारा आर्य समाज की स्थापना की गई:
- A1820 ई. में
- B1828 ई. में
- C1830 ई. में
- D1875 ई. में
उत्तर और व्याख्या देखें
सही उत्तर: (d) 1875 ई. में
व्याख्या
दयानंद सरस्वती (मूलशंकर) ने 1875 ई. में बंबई में आर्य समाज की स्थापना की, जिसका मुख्य उद्देश्य प्राचीन वैदिक धर्म को उसके शुद्ध रूप में फिर से स्थापित करना था। आर्य समाज आंदोलन मुख्यतः पश्चिमी प्रभावों की प्रतिक्रिया के रूप में फैला। 1877 ई. में आर्य समाज का मुख्यालय लाहौर में स्थापित हुआ, जिसके बाद इसका अधिक प्रचार हुआ। शुद्ध वैदिक परंपरा में आस्था के कारण स्वामी जी ने 'वेदों की ओर लौटो' का नारा दिया। स्वामी दयानंद का उद्देश्य भारत को धार्मिक, सामाजिक और राष्ट्रीय रूप से एक करना था। धार्मिक क्षेत्र में वे मूर्तिपूजा, बहुदेववाद, अवतारवाद, पशुबलि, अंधश्रद्धा, तंत्र-मंत्र और झूठे कर्मकांडों को स्वीकार नहीं करते थे। वे वेदों को ईश्वरीय ज्ञान मानते थे और उपनिषद काल तक के साहित्य को स्वीकार करते थे। आर्य समाज के नियम और सिद्धांत पहले बंबई में बनाए गए; बाद में 1877 ई. में लाहौर में उनका संपादन कर उन्हें निश्चित रूप दिया गया। आर्य समाज का प्रसार पंजाब में बहुत सफल रहा और कुछ हद तक उत्तर प्रदेश, गुजरात और राजस्थान में भी इसे सफलता मिली। महात्मा हंसराज, पंडित गुरुदत्त, लाला लाजपत राय और स्वामी श्रद्धानंद इसके प्रमुख कार्यकर्ता थे। 1893 ई. में आर्य समाज दो गुटों में बंट गया: एक गुट पाश्चात्य शिक्षा का समर्थक था और दूसरा विरोधी। पाश्चात्य शिक्षा के विरोधियों में स्वामी श्रद्धानंद (अन्य नाम: महात्मा मुंशीराम) और लेखराम प्रमुख थे, जिन्होंने 1902 ई. में 'गुरुकुल कांगड़ी' (गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय) की स्थापना की। पाश्चात्य शिक्षा के समर्थकों में लाला लाजपत राय और हंसराज प्रमुख थे, जिन्होंने 'दयानंद एंग्लो-वैदिक कॉलेज' की स्थापना की।